News Bhadas 4 India
TrendingUttar Pradesh

Varanasi Muslim Family Ravana Effigies: 3 Generations Keep Tradition Alive

वाराणसी में तीन पीढ़ियों से रावण के पुतले बना रहा मुस्लिम परिवार, गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल

वाराणसी। काशी में दशहरा सिर्फ बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी है। यहां एक मुस्लिम परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। शमशाद खान और उनका परिवार दशहरे के लिए विशालकाय रावण के पुतले तैयार करता है। परिवार के लिए यह काम महज रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि पुरखों से मिली विरासत और काशी की साझा सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का माध्यम है।

नाना ने शुरू की थी रावण के पुतले बनाने की परंपरा

शमशाद खान के मुताबिक, उनके परिवार में रावण के पुतले बनाने की शुरुआत उनके नाना ने की थी। समय के साथ यह हुनर परिवार की अगली पीढ़ियों तक पहुंचा और अब तीसरी पीढ़ी इस जिम्मेदारी को निभा रही है।

परिवार के सदस्य दशहरे से काफी पहले पुतले बनाने की तैयारी शुरू कर देते हैं। इसमें ढांचा तैयार करने से लेकर पुतले को आकार देने, रंगाई और सजावट तक कई चरण शामिल होते हैं। हर काम में अनुभव और बारीकी की जरूरत होती है, ताकि तैयार पुतला मजबूत और आकर्षक दिखाई दे।

शमशाद के लिए यह परंपरा परिवार की पुरानी पहचान से जुड़ी है। वह इस काम को आगे बढ़ाकर अपने नाना से मिली विरासत को संभाल रहे हैं।

75 फीट ऊंचा रावण बनाने में लगती है मेहनत

वाराणसी के बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) मैदान में दशहरे के लिए लगभग 75 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया जाता है। इतने विशाल पुतले को बनाने के लिए कारीगरों को कई सप्ताह तक मेहनत करनी पड़ती है।

पुतले का ढांचा तैयार करना, उसके अलग-अलग हिस्सों को जोड़ना और फिर उसे अंतिम रूप देना एक चुनौतीपूर्ण काम है। परिवार के सदस्य अपने अनुभव के आधार पर हर हिस्से की बनावट और सजावट पर विशेष ध्यान देते हैं।

पुतले के निर्माण में शमशाद खान के साथ उनके परिवार के सदस्य और सहयोगी भी जुटते हैं। सभी मिलकर काम करते हैं, ताकि दशहरे के आयोजन से पहले पुतला तैयार हो सके।

सात साथियों के साथ मिलकर करते हैं काम

शमशाद खान अपने इस पारंपरिक काम में करीब सात साथियों के साथ मिलकर जिम्मेदारी निभाते हैं। पुतले के निर्माण में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कोई ढांचा तैयार करता है, तो कोई उसे आकार देने और सजाने का काम करता है।

इतने बड़े पुतले को तैयार करने के लिए आपसी तालमेल और कारीगरी दोनों जरूरी हैं। वर्षों के अनुभव से परिवार ने इस काम में दक्षता हासिल की है और उसी हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है।

धर्म से ऊपर भाईचारे और साझा संस्कृति का संदेश

इस परिवार की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि एक मुस्लिम परिवार हिंदू त्योहार दशहरे के लिए रावण का पुतला बनाता है। यह परंपरा वाराणसी की गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है, जहां विभिन्न समुदायों के लोग एक-दूसरे की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहते हैं।

शमशाद खान के लिए यह काम किसी धार्मिक भेदभाव का विषय नहीं, बल्कि उनके परिवार का पारंपरिक हुनर है। परिवार कई पीढ़ियों से इस जिम्मेदारी को निभाता आया है और आज भी उसी समर्पण के साथ काम कर रहा है।

यह कहानी बताती है कि कला, मेहनत और परंपराएं लोगों को जोड़ने का काम करती हैं। त्योहारों से जुड़े ऐसे प्रयास समाज में आपसी सम्मान और सद्भाव को मजबूत करने का संदेश देते हैं।

दशहरे की तैयारियों में जुट जाता है पूरा परिवार

दशहरा नजदीक आते ही पुतला बनाने का काम तेज हो जाता है। परिवार के सदस्य समय पर काम पूरा करने के लिए लगातार मेहनत करते हैं। पुतले के आकार, बनावट और सजावट पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि आयोजन के दिन वह आकर्षण का केंद्र बने।

रावण दहन दशहरे के प्रमुख आयोजनों में शामिल है। इसके लिए तैयार होने वाले विशाल पुतले केवल उत्सव का हिस्सा नहीं होते, बल्कि इनके पीछे कारीगरों की मेहनत और वर्षों से चली आ रही परंपराएं भी जुड़ी होती हैं।

काशी की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा परिवार

वाराणसी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां की परंपराओं में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी शहर की साझा विरासत को मजबूत करती है। शमशाद खान का परिवार भी अपने काम के जरिए इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।

तीन पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने का यह सफर दिखाता है कि सांस्कृतिक विरासत किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होती। इसे जीवित रखने में उन सभी लोगों की भूमिका होती है, जो अपने हुनर और मेहनत से परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं।

निष्कर्ष: वाराणसी में रावण के पुतले बनाने वाला शमशाद खान का परिवार गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की मिसाल है। नाना से शुरू हुई यह परंपरा आज तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। परिवार का यह हुनर न केवल दशहरे के आयोजन को खास बनाता है, बल्कि काशी की साझा सांस्कृतिक विरासत का संदेश भी देता है।

दैनिक रुस्तम-ए-हिंद | उत्तर प्रदेश समाचार

Related posts

Meerut Husband Wife Car: दूसरी महिला के साथ पति को देखकर पत्नी ने किया विरोध, बोनट पर लटकी

bhadas4india

Delhi NCR Weather Today: Heavy Rain Alert, Strong Winds Expected

bhadas4india

Varanasi Air Force Day Air Show 2026: PM Modi to Witness Spectacular IAF Display

bhadas4india

Leave a Comment