सरकारी जमीनों की बिक्री पर कांग्रेस का हमला, राज्यपाल से फैसले रद्द करने और जांच कराने की मांग
देहरादून, 5 नवंबर। उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और बेशकीमती संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने के मुद्दे पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के 13 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि राज्य की महत्वपूर्ण सरकारी जमीनों और धरोहर भवनों को औने-पौने दामों पर निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है।
प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से सरकारी जमीनों और संपत्तियों को निजी हाथों में देने से जुड़े फैसलों को निरस्त करने तथा इन संपत्तियों को उनके मूल विभागों को वापस लौटाने की मांग की। इसके साथ ही कांग्रेस ने मंत्री गणेश जोशी की आय से अधिक संपत्ति के मामले में न्यायालय के निर्देशों का पालन कराने, सहकारिता विभाग में कोरोना काल के दौरान हुई नियुक्तियों की जांच कराने और एमबीबीएस में कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुए दाखिलों की जांच कराने की भी मांग उठाई।
संविधान के प्रावधानों का दिया हवाला
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने संविधान के अनुच्छेद 154 और 166 का उल्लेख किया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि अनुच्छेद 154 के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित है, जबकि अनुच्छेद 166 के अनुसार राज्य सरकार की कार्यवाही राज्यपाल के नाम से संचालित होती है।
ज्ञापन में कहा गया कि जिन शासनादेशों के माध्यम से उत्तराखंड की सरकारी जमीनों और धरोहर भवनों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, वे भी राज्यपाल की स्वीकृति के नाम से जारी होते हैं। ऐसे में राज्य की इन संपत्तियों के संवैधानिक संरक्षक होने के नाते राज्यपाल को पूरे मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए।
मुख्यमंत्री के पास अधिकार केंद्रित करने पर उठाए सवाल
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि 20 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय से संबंधित शासनादेश के माध्यम से सभी विभागों की सरकारी भूमि पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार मुख्यमंत्री को दे दिया गया। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 164(2) में वर्णित मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व और कार्य नियमावली के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
कांग्रेस ने कार्य नियमावली के नियम 3 में प्रभारी मंत्री और नियम 7 में बहुविभागीय मामलों में परामर्श से संबंधित प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी संपत्तियों के संबंध में निर्णय लेने की प्रक्रिया में संबंधित विभागों और मंत्रियों की भूमिका होनी चाहिए।
जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज पर उठाए सवाल
ज्ञापन में मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट का मामला प्रमुखता से उठाया गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के माध्यम से बाजार मूल्य के लिहाज से हजारों करोड़ रुपये की मानी जाने वाली इस संपत्ति की 142 एकड़ जमीन और राष्ट्रीय धरोहर को 15 वर्षों के लिए लगभग एक करोड़ रुपये सालाना किराये पर निजी कंपनी को लीज पर दे दिया गया।
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने दावा किया कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कंपनी अभिलेखों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में शामिल तीनों बोलीदाता कंपनियां एक ही व्यक्ति से जुड़ी थीं। पार्टी ने इस आधार पर टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रतिस्पर्धा पर सवाल उठाए।
कांग्रेस ने कहा कि सरकारी संपत्ति को इस तरह लीज पर देने की प्रक्रिया की वैधानिकता की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। प्रतिनिधिमंडल ने आरोप लगाया कि इस मामले में उत्तराखंड सरकार की कार्य नियमावली और उस समय लागू अधिप्राप्ति नियमावली के प्रावधानों का भी उल्लंघन हुआ है।
यूआईआईडीबी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने का आरोप
कांग्रेस ने सरकारी जमीनों और संपत्तियों के मुद्रीकरण से जुड़े उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट बोर्ड (यूआईआईडीबी) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का भी हवाला दिया।
ज्ञापन में कहा गया कि अधिनियम की धारा 28(3)(घ) के अनुसार प्रत्येक परियोजना के लिए सरकार और संबंधित विभाग की मंजूरी आवश्यक है। वहीं धारा 28(4) के तहत मुद्रीकरण राज्य सरकार के निर्देश पर ही किया जा सकता है।
कांग्रेस का आरोप है कि बाद में मूल विभाग की सहमति से जुड़ी शर्त को यह कहते हुए हटा दिया गया कि मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त है। पार्टी ने दावा किया कि सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लीज पर देने के लिए यूआईआईडीबी को हस्तांतरित करने वाली फाइलों में संबंधित विभागीय मंत्रियों की सहमति दर्ज नहीं है।
कई सरकारी संपत्तियों के हस्तांतरण का मामला उठाया
प्रतिनिधिमंडल ने अपने ज्ञापन में पटवाडांगर, नगऊ, धनौल्टी और मगरा सहित कई स्थानों की सरकारी जमीनों का उल्लेख किया। कांग्रेस के अनुसार, नियोजन विभाग की पत्रावली पर मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बाद जनवरी 2025 में शासनादेश संख्या 28, दिनांक 15 जनवरी 2025 जारी किया गया था।
इसके अलावा कांग्रेस ने ई-पत्रावली ई-93327 के नोट 19 का हवाला देते हुए कहा कि 19 नवंबर 2025 को मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बाद आईडीपीएल ऋषिकेश, डाकपत्थर, रामगढ़, एचएमटी रानीबाग, पाटकोट-मरचूला, सलेमपुर महमूद और माजरी ग्रांट की जमीनों से जुड़े मामलों में आगे की प्रक्रिया का रास्ता खुला। ज्ञापन में दिसंबर 2025 में जारी शासनादेश संख्या 815 का भी उल्लेख किया गया।
कांग्रेस ने इन पत्रावलियों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकारी विभागों की संपत्तियों को लीज पर देने या बेचने से जुड़े निर्णय मुख्यमंत्री स्तर पर अकेले लिए गए, जबकि यूआईआईडीबी अधिनियम के अनुसार ऐसे निर्णय बोर्ड के माध्यम से लिए जाने चाहिए।
अन्य मामलों की जांच कराने की भी मांग
सरकारी जमीनों के मुद्दे के साथ कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री गणेश जोशी की आय से अधिक संपत्ति के मामले में न्यायालय के निर्देशों का पालन कराने की मांग भी राज्यपाल के सामने रखी। इसके अलावा सहकारिता विभाग में कोरोना काल के दौरान हुई नियुक्तियों की जांच कराने और एमबीबीएस पाठ्यक्रम में कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिले दिए जाने के आरोपों की जांच कराने की मांग की गई।
कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से पूरे मामले का संज्ञान लेकर सरकारी संपत्तियों से जुड़े विवादित निर्णयों की समीक्षा कराने, संबंधित आदेशों को निरस्त करने और संपत्तियों को उनके मूल विभागों को लौटाने की मांग की।
पार्टी का कहना है कि राज्य की जमीनें और ऐतिहासिक धरोहरें सार्वजनिक संपत्ति हैं। इनके उपयोग और हस्तांतरण में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होना चाहिए।

