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Rupal PalRupal Palli Mahotsav 2026: ₹70–80 Crore Worth of Ghee Offered to Varadayini Matai Mahotsav 2026: ₹70–80 Crore Worth of Ghee Offered to Varadayini Mata

गुजरात के रूपाल में वरदायिनी माता का भव्य पल्ली महोत्सव, घी से सराबोर हुईं सड़कें; उमड़े लाखों श्रद्धालु

उपशीर्षक: गांधीनगर के रूपाल गांव में सदियों पुरानी परंपरा के तहत निकली माता की पल्ली, श्रद्धालुओं ने चढ़ाया घी; पांडवों से जुड़ी है इस अनूठे उत्सव की मान्यता

गांधीनगर, गुजरात। गुजरात के गांधीनगर के निकट स्थित रूपाल गांव में जगतजननी श्री वरदायिनी माताजी का पारंपरिक पल्ली महोत्सव इस बार भी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। आश्विन मास की नवमी यानी आसो नोम की रात आयोजित इस धार्मिक उत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचे। माता की पल्ली के मंदिर लौटने के समय भी भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान श्रद्धालुओं ने माता को घी अर्पित किया, जिससे गांव की सड़कों पर कई जगह घी बहता दिखाई दिया।

रूपाल का पल्ली महोत्सव गुजरात की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है। इस आयोजन में आस्था, लोकविश्वास और सदियों पुरानी परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। हर साल नवरात्रि की नौवीं रात माता की पल्ली निकाली जाती है और भक्त इसमें शामिल होकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

क्या है पल्ली महोत्सव की परंपरा?

पल्ली का अर्थ माता के लिए तैयार किया गया लकड़ी का विशेष रथ है, जिसे पारंपरिक रूप से बिना घोड़ों के निकाला जाता है। नवरात्रि की नवमी की रात इस पल्ली को रूपाल गांव में घुमाया जाता है। रास्ते में श्रद्धालु माता को घी अर्पित करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।

इस दौरान गांव की गलियों और सड़कों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। माता की पल्ली के दर्शन करने और उसमें अपनी आस्था प्रकट करने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं। पूरी रात चलने वाले इस आयोजन में धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल बना रहता है।

घी चढ़ाने की अनूठी परंपरा

रूपाल पल्ली महोत्सव की सबसे खास पहचान माता को घी अर्पित करने की परंपरा है। श्रद्धालु पल्ली के सामने घी चढ़ाते हैं। भक्तों की बड़ी संख्या और भारी मात्रा में घी अर्पित किए जाने के कारण गांव की सड़कों पर कई जगह घी बहने लगता है।

इस बार भी घी के चढ़ावे को लेकर बड़ी मात्रा में चर्चा रही। मीडिया रिपोर्टों में अनुमान जताया गया कि इस आयोजन में करीब 70 से 80 करोड़ रुपये मूल्य का घी चढ़ाया गया। हालांकि, इस राशि को आधिकारिक रूप से प्रमाणित आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

माता के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था इस आयोजन को खास बनाती है। भक्त अपनी मनोकामनाओं, श्रद्धा और परंपरा के अनुसार घी अर्पित करते हैं। इसी वजह से पल्ली महोत्सव की चर्चा गुजरात के बाहर भी होती है।

पांडवों से जुड़ी है पल्ली महोत्सव की मान्यता

रूपाल में प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, वरदायिनी माता की पल्ली की परंपरा पांडवों के समय से जुड़ी हुई है। लोककथाओं में बताया जाता है कि पांडवों ने माता के लिए सोने की पल्ली बनाई थी। समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदला, लेकिन माता की पल्ली निकालने की परंपरा आज भी जारी है।

यह मान्यता स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। इसके ऐतिहासिक विवरणों को लेकर स्वतंत्र प्रमाण अलग विषय हैं, लेकिन रूपाल के लोगों और श्रद्धालुओं के लिए इस परंपरा का गहरा धार्मिक महत्व है।

सर्वधर्म समभाव का प्रतीक माना जाता है उत्सव

रूपाल के पल्ली महोत्सव को केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी और आपसी सद्भाव से भी जोड़कर देखा जाता है। इस उत्सव में बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं और परंपरा को आगे बढ़ाने में स्थानीय समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़, पूजा-अर्चना और पल्ली के दर्शन पूरे गांव को उत्सव के रंग में रंग देते हैं। यही वजह है कि यह आयोजन स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बन चुका है।

मंदिर लौटी पल्ली, दर्शन के लिए उमड़ी भीड़

माता की पल्ली जब अपनी परिक्रमा पूरी करके मंदिर लौटी, तो दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जमा हो गई। भक्तों ने माता के दर्शन किए और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद मांगा। आयोजन के दौरान गांव में देर रात तक धार्मिक गतिविधियां जारी रहीं।

रूपाल का पल्ली महोत्सव गुजरात की प्राचीन लोकआस्था और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। घी अर्पित करने की विशिष्ट रस्म, पांडवों से जुड़ी मान्यता और श्रद्धालुओं की विशाल भागीदारी इसे देश के अनूठे धार्मिक आयोजनों में शामिल करती है।

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