सुप्रीम कोर्ट को जमानत कानून पर सलाह देना ट्रायल जज को पड़ा भारी, कोर्ट ने मांगा स्पष्टीकरण
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के एक ट्रायल जज के उस रवैये पर नाराजगी जताई है, जिसमें उन्होंने एक मामले में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट को अपनी राय और सलाह भेज दी थी। जज ने ट्रायल पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मांगते हुए सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था। इसी पत्र में उन्होंने जमानत कब दी जानी चाहिए और कब नहीं, इस संबंध में भी टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को उचित नहीं माना और जज से स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश दिया।
क्या है पूरा मामला?
मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बारासात का है। यहां अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, तृतीय न्यायालय के सामने एक आपराधिक मामले की सुनवाई चल रही थी। आरोपी करीब पांच साल से मुकदमे का सामना कर रहा था और उसकी जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंची थी।
सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया था कि मामले की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरी की जाए। कोर्ट ने ट्रायल पूरा होने के बाद रिपोर्ट पेश करने का भी निर्देश दिया था।
ट्रायल पूरा करने के लिए मांगा था अतिरिक्त समय
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक तय समय में मुकदमे की सुनवाई पूरी करना संभव नहीं होने पर बारासात के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजकर अतिरिक्त समय मांगा।
हालांकि, समय बढ़ाने का अनुरोध करने वाले इस पत्र के अंतिम हिस्सों में जज ने जमानत कानून और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने को लेकर अपनी राय भी रख दी। यही हिस्सा सुप्रीम कोर्ट की पीठ को आपत्तिजनक लगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जज के पत्र पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के पीठासीन अधिकारी का काम यह बताना नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट को कब जमानत देनी चाहिए और कब नहीं।
पीठ ने पत्र के अंतिम दो पैराग्राफ को लेकर स्पष्ट असहमति जताई और सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को संबंधित ट्रायल जज से स्पष्टीकरण लेने का निर्देश दिया।
न्यायिक व्यवस्था में अदालतों की भूमिका
यह मामला न्यायिक व्यवस्था में अलग-अलग स्तर की अदालतों की भूमिका और उनके बीच संवाद की सीमाओं से भी जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट के जज किसी मामले में तथ्य और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर फैसला करते हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च अदालत है और उसके सामने लंबित मामले में अंतिम न्यायिक निर्णय लेने का अधिकार उसी का है।
ऐसे में किसी मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए समय मांगते हुए सुप्रीम कोर्ट को यह सलाह देना कि उसे जमानत किस परिस्थिति में देनी चाहिए या नहीं देनी चाहिए, अदालत को उचित नहीं लगा।
किस मामले से जुड़ा है विवाद?
यह मामला Amit Ghosh बनाम State of West Bengal से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला SLP (Criminal) No. 8043 of 2026 के रूप में दर्ज है। मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 28 सितंबर 2026 को आदेश पारित किया था।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को संबंधित ट्रायल जज से स्पष्टीकरण लेने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद जज की ओर से दिए गए जवाब और मामले की परिस्थितियों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी जज द्वारा भेजे गए पत्र में जमानत को लेकर की गई टिप्पणियों पर है। मामले में आगे की प्रक्रिया स्पष्टीकरण मिलने के बाद स्पष्ट होगी।

