अंकिता भंडारी हत्याकांड: दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बनाने पर विवाद, दिल्ली में इंडिया गेट पर धरने पर बैठे माता-पिता
देहरादून/नई दिल्ली। उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के विरोध में अंकिता भंडारी के माता-पिता दिल्ली के इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गए हैं। इस नियुक्ति के बाद उत्तराखंड में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। विपक्षी दलों ने मामले से जुड़े कथित वीआईपी की पहचान और जांच को लेकर सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 12 अक्टूबर 2026 को दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया था। इसके बाद अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर पहले से जारी विवाद फिर चर्चा में आ गया। हालांकि, इस मामले में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने या उसे अपराध से जोड़ने के लिए न्यायिक रूप से स्थापित तथ्यों और आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है।
दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के बाद क्यों बढ़ा विवाद?
दुष्यंत कुमार गौतम भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे हैं। राज्यपाल के पद पर उनकी नियुक्ति के बाद उत्तराखंड कांग्रेस ने इस फैसले पर सवाल उठाए और अंकिता भंडारी मामले से जुड़े कथित वीआईपी विवाद को फिर उठाया।
अंकिता के माता-पिता का विरोध भी इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच सामने आया है। उनकी मांगों और इस मामले से जुड़े सवालों को लेकर चर्चा तेज हुई है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर उत्तराखंड में महिला सुरक्षा, न्याय और चर्चित आपराधिक मामलों की जांच को लेकर बहस को केंद्र में ला दिया है।
क्या है अंकिता भंडारी हत्याकांड?
अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में एक रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या का मामला सामने आया था। जांच के अनुसार, अंकिता पर रिजॉर्ट में आने वाले एक अतिथि को विशेष सेवाएं देने का दबाव बनाया जा रहा था। मामले के सामने आने के बाद पूरे उत्तराखंड में विरोध प्रदर्शन हुए और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग उठी।
जांच के बाद रिजॉर्ट संचालक पुलकित आर्य और उसके दो सहयोगियों, सौरभ भास्कर तथा अंकित गुप्ता, को गिरफ्तार किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए। जून 2025 में अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
इस फैसले के बाद भी कथित वीआईपी की पहचान को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि, कथित वीआईपी को लेकर लगाए गए आरोपों को अदालत में प्रमाणित तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है, जब तक उनके समर्थन में न्यायिक निष्कर्ष उपलब्ध न हों।

