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Delhi School Books Controversy: Saurabh Bharadwaj Questions Book Quality, Ashish Sood Responds

दिल्ली के सरकारी स्कूलों की किताबों पर सियासी घमासान, सौरभ भारद्वाज ने गुणवत्ता पर उठाए सवाल, शिक्षा मंत्री आशीष सूद का पलटवार

AAP नेता ने एनसीईआरटी और सरकारी टेंडर के तहत छपी किताबों की तुलना कर खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए, शिक्षा मंत्री बोले—65 रुपये की किताब 20.61 रुपये में खरीदी गई

नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2026। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को मुफ्त वितरित की जाने वाली पाठ्यपुस्तकों की खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि सरकारी स्कूलों के बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही किताबों की गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया की गंभीर समीक्षा होनी चाहिए।

सौरभ भारद्वाज ने बाजार में उपलब्ध राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की किताबों और दिल्ली सरकार के टेंडर के तहत छापी गई पाठ्यपुस्तकों की तुलना करते हुए कागज की गुणवत्ता, किताबों के आकार और छपाई को लेकर सवाल उठाए।

वहीं, दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने इन आरोपों पर पलटवार करते हुए सरकार की खरीद प्रक्रिया का बचाव किया। उन्होंने कहा कि जिस ‘मल्हार’ किताब को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसे सरकार ने महज 20 रुपये 61 पैसे में खरीदा है, जबकि एनसीईआरटी की ओर से उसी किताब का मूल्य 65 रुपये बताया गया है।

इस विवाद के बाद दिल्ली की राजनीति में शिक्षा व्यवस्था, सरकारी खरीद और विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाने वाली पाठ्यसामग्री की गुणवत्ता को लेकर बहस तेज हो गई है।

सौरभ भारद्वाज ने किताबों की गुणवत्ता पर उठाए सवाल

आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में मुफ्त वितरित की जाने वाली किताबों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने बाजार में उपलब्ध एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक और दिल्ली सरकार के टेंडर के माध्यम से प्रकाशित किताब की तुलना की।

भारद्वाज ने दावा किया कि दोनों किताबों के कागज, आकार और छपाई में अंतर दिखाई देता है। उन्होंने इन अंतरों के आधार पर सरकारी खरीद प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर सवाल किए।

AAP नेता ने यह मुद्दा उठाया कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को अच्छी गुणवत्ता वाली पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।

हालांकि, किताबों की गुणवत्ता को लेकर किए गए इन दावों की किसी स्वतंत्र तकनीकी जांच का निष्कर्ष उपलब्ध जानकारी में सामने नहीं आया है।

किताबों के कागज, आकार और प्रिंटिंग पर विवाद

सौरभ भारद्वाज ने किताबों की तुलना करते हुए मुख्य रूप से तीन पहलुओं पर सवाल उठाए।

पहला सवाल पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल किए गए कागज की गुणवत्ता को लेकर था। दूसरा किताबों के आकार और बनावट से संबंधित था, जबकि तीसरा सवाल छपाई की गुणवत्ता को लेकर उठाया गया।

उनका आरोप था कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विद्यार्थियों के लिए खरीदी गई किताबों की गुणवत्ता किस आधार पर तय की गई।

सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को मुफ्त किताबें दी जाती हैं। ऐसे में पाठ्यपुस्तकों की खरीद और वितरण में गुणवत्ता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

हालांकि, किताब के आकार या कागज में अंतर होना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। इसके लिए संबंधित टेंडर की शर्तों, तकनीकी मानकों और गुणवत्ता परीक्षण के परिणामों की जांच आवश्यक होती है।

शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने आरोपों पर किया पलटवार

AAP नेता के आरोपों के बाद दिल्ली सरकार की ओर से शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने किताबों की कीमत और खरीद प्रक्रिया को लेकर सरकार का पक्ष रखा।

आशीष सूद ने स्पष्ट किया कि ‘मल्हार’ नाम की जिस पाठ्यपुस्तक को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, उसे दिल्ली सरकार ने 20 रुपये 61 पैसे प्रति प्रति की दर से खरीदा है।

उन्होंने इसकी तुलना एनसीईआरटी की ओर से निर्धारित 65 रुपये के मूल्य से की।

शिक्षा मंत्री ने इस कीमत के अंतर को सामने रखते हुए विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया और सरकारी खरीद का बचाव किया।

65 रुपये की किताब 20.61 रुपये में कैसे मिली?

इस विवाद में ‘मल्हार’ पाठ्यपुस्तक की कीमत प्रमुख मुद्दा बन गई है।

शिक्षा मंत्री आशीष सूद के अनुसार, एनसीईआरटी की ओर से 65 रुपये में उपलब्ध किताब को दिल्ली सरकार ने 20.61 रुपये में खरीदा।

<text preserveWhitespace={false}>दोनों कीमतों के बीच 44 रुपये 39 पैसे का अंतर है। यह एनसीईआरटी के बताए गए मूल्य की तुलना में लगभग 68 प्रतिशत कम है।</text>

हालांकि, बाजार में उपलब्ध पुस्तक का खुदरा मूल्य और बड़े सरकारी टेंडर के अंतर्गत तय खरीद मूल्य अलग-अलग हो सकते हैं।

थोक खरीद, छपाई की मात्रा, कागज की विशिष्टताएं और आपूर्ति की शर्तें कीमत को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए केवल कीमत के अंतर के आधार पर किताब की गुणवत्ता अच्छी या खराब होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

सरकारी स्कूलों के बच्चों की शिक्षा पर राजनीतिक बहस

दिल्ली में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से राजनीतिक चर्चा का विषय रही है।

आम आदमी पार्टी अपनी पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में सरकारी स्कूलों में किए गए सुधारों को प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती रही है।

वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाली वर्तमान दिल्ली सरकार शिक्षा व्यवस्था में अपनी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों को आगे बढ़ा रही है।

ऐसे में पाठ्यपुस्तकों की खरीद और गुणवत्ता को लेकर सामने आया यह विवाद राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गया है।

AAP नेता जहां किताबों की गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं शिक्षा मंत्री सरकार की ओर से निर्धारित कीमतों और खरीद व्यवस्था का बचाव कर रहे हैं।

किताबों की गुणवत्ता का निर्धारण कैसे होता है?

स्कूलों में वितरित की जाने वाली पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता कई मानकों पर निर्भर करती है।

इनमें कागज की मोटाई, छपाई की स्पष्टता, अक्षरों की पठनीयता, बाइंडिंग और पुस्तक के टिकाऊपन जैसे पहलू शामिल होते हैं।

इसके अतिरिक्त किताब में प्रकाशित सामग्री की शुद्धता और निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप होना भी महत्वपूर्ण है।

सरकारी टेंडर के माध्यम से किताबें खरीदते समय संबंधित विभाग द्वारा तय तकनीकी मानकों और अनुबंध की शर्तों का पालन किया जाना चाहिए।

यदि किसी किताब की गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आती है, तो उसका परीक्षण निर्धारित मानकों के आधार पर किया जा सकता है।

दिल्ली के मौजूदा विवाद में भी गुणवत्ता को लेकर उठाए गए सवालों का स्पष्ट समाधान तकनीकी परीक्षण और खरीद संबंधी दस्तावेजों के आधार पर ही संभव होगा।

मुफ्त पाठ्यपुस्तक वितरण की अहमियत

सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को मुफ्त किताबें उपलब्ध कराने का उद्देश्य शिक्षा को अधिक सुलभ बनाना है।

विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए यह सुविधा महत्वपूर्ण होती है।

पाठ्यपुस्तकों की समय पर उपलब्धता विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रभावित करती है। इसके साथ ही किताबों की गुणवत्ता भी आवश्यक है, ताकि विद्यार्थी पूरे शैक्षणिक सत्र में उनका उपयोग कर सकें।

शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, सार्वजनिक खरीद में लागत और गुणवत्ता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है।

सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक धन का उचित उपयोग हो और विद्यार्थियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप पाठ्यसामग्री मिले।

खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता का सवाल

दिल्ली के इस विवाद ने सरकारी खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

जब किसी सरकारी विभाग द्वारा बड़ी मात्रा में पाठ्यपुस्तकों की खरीद की जाती है, तो टेंडर की शर्तें, निर्धारित गुणवत्ता मानक और आपूर्ति की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती हैं।

विपक्ष की ओर से सवाल उठाए जाने के बाद संबंधित दस्तावेजों और मानकों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा हो सकता है।

हालांकि, अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर किताबों की खरीद में भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है।

सौरभ भारद्वाज की ओर से उठाए गए सवाल राजनीतिक आरोप हैं, जबकि आशीष सूद द्वारा बताई गई कीमत दिल्ली सरकार का पक्ष है।

दोनों पक्षों के दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन संबंधित दस्तावेजों और गुणवत्ता परीक्षण के आधार पर ही किया जा सकता है।

बच्चों को गुणवत्तापूर्ण किताबें उपलब्ध कराना प्राथमिकता

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकें शिक्षा का बुनियादी साधन हैं।

इसलिए किताबों की खरीद में पारदर्शिता, गुणवत्ता और समय पर वितरण सुनिश्चित करना आवश्यक है।

यदि किताबों के कागज या छपाई को लेकर कोई वास्तविक कमी सामने आती है, तो उसका समाधान किया जाना चाहिए।

साथ ही, यदि खरीद निर्धारित मानकों के अनुरूप हुई है, तो संबंधित तथ्यों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने से विवाद दूर करने में सहायता मिल सकती है।

शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक आवश्यक विद्यार्थियों के हितों को प्राथमिकता देना है।

दिल्ली की सियासत में जारी है आरोप-प्रत्यारोप

AAP नेता सौरभ भारद्वाज द्वारा उठाए गए सवालों और शिक्षा मंत्री आशीष सूद के जवाब के बाद पाठ्यपुस्तकों की खरीद का मुद्दा दिल्ली की राजनीतिक बहस में शामिल हो गया है।

एक ओर विपक्ष किताबों की गुणवत्ता पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर सरकार कम खरीद मूल्य का हवाला देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट कर रही है।

इस विवाद में आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किताबों की गुणवत्ता को लेकर उठाए गए सवालों पर कोई तकनीकी जांच या अतिरिक्त स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं।

फिलहाल दिल्ली के सरकारी स्कूलों की किताबों को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। सौरभ भारद्वाज ने गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जबकि शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने 65 रुपये की ‘मल्हार’ किताब 20.61 रुपये में खरीदे जाने का दावा करते हुए सरकार का बचाव किया है। अब इस मामले में खरीद के दस्तावेजों और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के आधार पर स्थिति स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा।

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