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KGMU STF Investigation Report: 12 Cases of Harassment and Conversion Pressure

KGMU में महिला डॉक्टरों के शोषण और धर्म परिवर्तन के दबाव के 12 मामले, STF की 7 पेज की रिपोर्ट से मचा हड़कंप

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों के कथित यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग, धर्म परिवर्तन के दबाव और शिकायतों को दबाने का मामला सामने आया है। करीब 10 महीने की जांच के बाद उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने शासन को सात पेज की रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट में 12 कथित मामलों का उल्लेख किया गया है। जांच के दायरे में विश्वविद्यालय के पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, रेडियोलॉजी और गांधी वार्ड विभाग आए हैं।

एसटीएफ की रिपोर्ट में कई डॉक्टरों, नर्सिंग कर्मचारियों और विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कुछ महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों को प्रेम संबंधों में फंसाकर उन पर धर्म परिवर्तन और निकाह का दबाव बनाया गया। वहीं, शिकायत करने पर करियर खराब करने, परीक्षा में फेल कराने और नौकरी से हटवाने जैसी धमकियां देने के आरोप भी सामने आए हैं।

KGMU के चार विभागों में सामने आए कथित मामले

एसटीएफ की जांच में गांधी वार्ड, पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी विभाग से जुड़ी शिकायतों की पड़ताल की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इन विभागों में काम करने वाली महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों ने शारीरिक शोषण, मानसिक उत्पीड़न, ब्लैकमेलिंग और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने की शिकायतें की थीं।

जांच एजेंसी ने शिकायतों के साथ विभागीय स्तर पर हुई कार्रवाई और अधिकारियों की भूमिका की भी पड़ताल की। रिपोर्ट में कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं की सुनवाई नहीं होने और कथित तौर पर आरोपियों को संरक्षण दिए जाने का उल्लेख किया गया है।

डॉ. रमीजुद्दीन नायक पर छह महिला डॉक्टरों के शोषण का आरोप

एसटीएफ की रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीजुद्दीन नायक का नाम प्रमुखता से सामने आया है। उन पर छह महिला डॉक्टरों के शोषण और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोपों का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, एक जूनियर महिला डॉक्टर की शिकायत के अलावा आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से जुड़ी एक बैचमेट और अन्य महिला डॉक्टरों ने भी गंभीर आरोप लगाए थे।

इस मामले में 23 दिसंबर 2025 को लखनऊ के चौक थाने में शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज होने का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. रमीज को 9 जनवरी 2026 को गिरफ्तार किया गया था। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और आरोपों की न्यायिक स्थिति अलग विषय है।

गांधी वार्ड के नर्सिंग स्टाफ पर भी गंभीर आरोप

एसटीएफ की रिपोर्ट में गांधी वार्ड के नर्सिंग स्टाफ से जुड़े मामलों का भी जिक्र है। नर्सिंग कर्मचारी नफीस पर एक हिंदू महिला कर्मचारी को कथित तौर पर प्रेम संबंध में फंसाकर उसका शारीरिक शोषण करने और धर्म परिवर्तन के बाद निकाह करने का आरोप लगाया गया है।

इसी तरह फुरकान पर भी एक महिला कर्मचारी को प्रेम संबंध में फंसाकर धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए प्रेरित करने के आरोपों का उल्लेख है।

जांच रिपोर्ट में इन शिकायतों से जुड़े घटनाक्रम और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच किए जाने की बात सामने आई है।

माइक्रोबायोलॉजी विभाग में महिला कर्मचारी से छेड़छाड़ का आरोप

माइक्रोबायोलॉजी विभाग में संविदा पर काम करने वाली महिला कंप्यूटर ऑपरेटर ज्योति राव से जुड़ा मामला भी एसटीएफ की जांच में शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारी शफात अली खान पर महिला कर्मचारी के साथ छेड़छाड़ करने, पीछा करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप लगाए गए हैं।

शिकायत के बाद पीड़िता की संविदा नौकरी समाप्त किए जाने का मामला भी रिपोर्ट में उठाया गया है। इस घटनाक्रम में विभागीय स्तर पर की गई कार्रवाई और शिकायत के निस्तारण को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।

रेडियोलॉजी विभाग के डॉक्टर पर ब्लैकमेलिंग का आरोप

एसटीएफ की रिपोर्ट में रेडियोलॉजी विभाग के डॉ. रिजवान पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उन पर दो महिला डॉक्टरों को कथित तौर पर ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का आरोप है।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिकायत करने पर महिला डॉक्टरों को परीक्षा में फेल करने और उनका करियर खराब करने की धमकी दिए जाने की बात भी सामने आई है।

एसटीएफ ने इन शिकायतों से जुड़े तथ्यों और संबंधित विभागीय परिस्थितियों की जांच की है।

विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल

इस पूरे मामले में सिर्फ डॉक्टरों और कर्मचारियों की भूमिका ही नहीं, बल्कि विभागीय अधिकारियों के कामकाज पर भी सवाल उठाए गए हैं।

एसटीएफ की रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कय्यूम का उल्लेख है। आरोप है कि शिकायतों के निस्तारण में पक्षपात किया गया और कुछ मामलों में आरोपियों को बचाने की कोशिश हुई।

इसके अलावा बायोकेमिस्ट्री विभाग के लैब इंचार्ज डॉ. वाहिद अली सहित कुछ अन्य लोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि शिकायतकर्ताओं को उचित सहायता नहीं मिलने और विभागीय स्तर पर कार्रवाई में देरी जैसे पहलुओं की भी जांच की गई।

छठ पूजा और अंतिम संस्कार में छुट्टी को लेकर भेदभाव का आरोप

एसटीएफ की रिपोर्ट में छुट्टियों के आवंटन को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ हिंदू रेजिडेंट डॉक्टरों को छठ पूजा जैसे त्योहारों और परिजनों के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए छुट्टी मांगने पर कथित तौर पर अपमानित किया जाता था।

वहीं, आरोप है कि मुस्लिम डॉक्टरों और कर्मचारियों को नमाज पढ़ने और रिश्तेदारों के निकाह में शामिल होने के लिए आसानी से छुट्टी मिल जाती थी।

एसटीएफ ने इस मामले को भी अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों और संस्थान का पक्ष सामने आना बाकी है।

एसटीएफ चीफ ने शासन को भेजी सात पेज की रिपोर्ट

KGMU में कथित उत्पीड़न और धर्म परिवर्तन के मामलों की शिकायत मिलने के बाद जांच उत्तर प्रदेश एसटीएफ को सौंपी गई थी। जांच की जिम्मेदारी एडिशनल एसपी प्रमेश शुक्ला को दी गई थी।

करीब 10 महीने की जांच के बाद एसटीएफ चीफ और एडीजी कानून-व्यवस्था अमिताभ यश ने सात पेज की संस्तुति रिपोर्ट शासन को भेजी।

इसके बाद 30 अक्टूबर 2026 को चिकित्सा शिक्षा अनुभाग-दो के संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी की ओर से KGMU के कुलसचिव को पत्र भेजा गया। इसमें रिपोर्ट में चिह्नित डॉक्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों के खिलाफ KGMU अधिनियम 2002 और परिनियमावली 2011 के तहत नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

शासन ने KGMU प्रशासन से कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी है।

अब KGMU प्रशासन की कार्रवाई पर नजर

एसटीएफ की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस मामले में शासन और KGMU प्रशासन की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। रिपोर्ट में कई विभागों से जुड़े गंभीर आरोपों और शिकायतों का उल्लेख किया गया है।

फिलहाल आरोपों की जांच, संबंधित लोगों का पक्ष और कानूनी प्रक्रिया पूरी होना बाकी है। रिपोर्ट में किसी व्यक्ति का नाम आने मात्र से उसका दोष अदालत में साबित नहीं माना जा सकता। अब देखना होगा कि शासन के निर्देशों के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन संबंधित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ क्या कदम उठाता है।

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