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Election Commission RTI Controversy: Cabinet Secretariat Did Not Act on Two Election Commissioners’ Complaints

चुनाव आयोग में अधिकारियों के कामकाज को लेकर विवाद: दो चुनाव आयुक्तों की शिकायत पर कैबिनेट सचिवालय ने क्यों नहीं की कार्रवाई? RTI से सामने आए दस्त चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अधिकारी के आचरण और काम के बंटवारे में बदलाव पर उठाए थे सवाल, कैबिनेट सचिवालय ने आयोग की औपचारिक सूचना के अभाव में कार्रवाई को अनुचित बताया।

नई दिल्ली, 22 अक्टूबर 2026। भारत निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेजों के बाद चर्चा में आ गया है। दस्तावेजों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा आयोग के एक अधिकारी के आचरण के संबंध में उठाई गई शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई नहीं की। सचिवालय ने इसके पीछे आयोग की ओर से औपचारिक सूचना नहीं मिलने और निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला दिया।

यह मामला चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के काम के बंटवारे, प्रशासनिक अधिकारों और निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ा बताया जा रहा है। आरटीआई के माध्यम से सामने आए पत्राचार ने इस बात को लेकर सवाल खड़े किए हैं कि संवैधानिक संस्था के भीतर प्रशासनिक मतभेदों का समाधान किस प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।

आरटीआई से सामने आया महत्वपूर्ण पत्राचार

आरटीआई कार्यकर्ता एवं सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा को प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिवालय के समक्ष एक अधिकारी के आचरण को लेकर शिकायत उठाई थी।

दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के प्रशासनिक कामकाज और अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे में किए गए बदलावों पर आपत्ति जताई थी।

दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि शिकायत का मुख्य विषय संबंधित अधिकारी द्वारा काम के बंटवारे से जुड़े आदेश जारी करना और इस प्रक्रिया में आयोग के पूर्व निर्देशों के पालन का सवाल था।

चुनाव आयुक्तों ने अधिकारी के आचरण पर उठाए सवाल

सामने आए पत्राचार के अनुसार, चुनाव आयुक्तों का कहना था कि आयोग के भीतर कामकाज और जिम्मेदारियों के बंटवारे में बदलाव करने से पहले उचित विचार-विमर्श और आवश्यक मंजूरी ली जानी चाहिए।

उनकी आपत्ति इस बात को लेकर थी कि संबंधित अधिकारी ने कथित तौर पर ऐसे आदेश जारी किए, जिनके लिए आयोग से पूर्व चर्चा या स्वीकृति आवश्यक बताई गई थी।

शिकायत में यह भी कहा गया कि इस प्रकार के बदलाव न करने के संबंध में पहले कई बार मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे।

इन आरोपों से आयोग के भीतर प्रशासनिक निर्देशों के अनुपालन और अधिकारियों की जवाबदेही का प्रश्न सामने आया।

कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

आरटीआई से प्राप्त एक कैबिनेट नोट में दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं किए जाने का कारण बताया गया है।

नोट के अनुसार, चुनाव आयोग की ओर से आधिकारिक सूचना प्राप्त हुए बिना किसी अधिकारी के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों की शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करना प्रशासनिक दृष्टि से अनुचित हो सकता है।

कैबिनेट सचिवालय का रुख यह था कि संबंधित मामले में आयोग की संस्थागत प्रक्रिया और औपचारिक निर्णय को महत्व दिया जाना आवश्यक है।

इस प्रकार सचिवालय ने शिकायतों के आधार पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय आयोग की आधिकारिक स्थिति और निर्धारित प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना।

26 सितंबर को चुनाव आयोग ने दी थी सफाई

इस मामले में चुनाव आयोग ने 26 सितंबर 2026 को एक बयान जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।

आयोग के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों के निर्देशों के बाद संबंधित अधिकारी द्वारा जारी काम के बंटवारे से जुड़े आदेश प्रभावी नहीं हुए थे।

आयोग की इस सफाई से यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि विवादित प्रशासनिक आदेशों को लागू नहीं किया गया।

हालांकि, आदेश जारी किए जाने की परिस्थितियों और संबंधित अधिकारी के आचरण को लेकर उठाए गए सवाल अलग प्रशासनिक विषय बने रहे।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में सामने आया मामला

यह पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक कामकाज से संबंधित है।

भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त महत्वपूर्ण निर्णय लेने की जिम्मेदारी निभाते हैं।

ऐसे में अधिकारियों के कार्य विभाजन और प्रशासनिक आदेशों को लेकर मतभेद सामने आना संस्थागत कार्यप्रणाली की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी अन्य अधिकारी के व्यक्तिगत स्तर पर दोषी होने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर था विवाद

सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, विवाद की एक प्रमुख वजह आयोग के भीतर अधिकारियों की जिम्मेदारियों और काम के बंटवारे में बदलाव से जुड़े आदेश थे।

चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि आयोग से पूर्व विचार-विमर्श और मंजूरी लिए बिना ऐसे बदलाव नहीं किए जाने चाहिए।

उनका कहना था कि इस संबंध में पहले भी निर्देश दिए गए थे, जिनका पालन सुनिश्चित किया जाना आवश्यक था।

यह मुद्दा केवल किसी अधिकारी के कार्यक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं में प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया और जवाबदेही से भी जुड़ा है।

संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता का सवाल

भारत निर्वाचन आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संवैधानिक संस्था है।

आयोग की प्रशासनिक स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।

इस मामले में कैबिनेट सचिवालय द्वारा आयोग की औपचारिक सूचना पर जोर दिए जाने को प्रशासनिक प्रक्रिया और संस्थागत अधिकारों के संदर्भ में देखा जा सकता है।

वहीं, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा अधिकारी के आचरण पर आपत्ति उठाया जाना यह सवाल भी सामने लाता है कि आयोग के भीतर शिकायतों के समाधान के लिए किस स्तर पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

आरटीआई के जरिए सामने आई प्रशासनिक प्रक्रिया

सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने इस मामले से जुड़े पत्राचार और प्रशासनिक विचार-विमर्श को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है।

सूचना का अधिकार अधिनियम सरकारी संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

इस मामले में भी आरटीआई के जरिए यह जानकारी सामने आई कि चुनाव आयुक्तों की शिकायतों पर कैबिनेट सचिवालय ने किस आधार पर कार्रवाई नहीं की।

हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों से शिकायतों की वास्तविकता या संबंधित अधिकारी की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण नहीं होता।

शिकायत और कार्रवाई के बीच प्रक्रियागत सवाल

इस घटनाक्रम में दो अलग-अलग पहलू सामने आए हैं।

पहला, चुनाव आयुक्तों द्वारा संबंधित अधिकारी के आचरण और प्रशासनिक आदेशों पर आपत्ति जताना।

दूसरा, कैबिनेट सचिवालय द्वारा आयोग की आधिकारिक सूचना के अभाव में कार्रवाई को अनुचित मानना।

इन दोनों पहलुओं से यह प्रश्न उठता है कि किसी संवैधानिक संस्था के भीतर वरिष्ठ पदाधिकारियों की शिकायतों को किस प्रकार और किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारों की स्पष्टता और शिकायतों के निस्तारण की पारदर्शी प्रक्रिया ऐसे विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर बढ़ी चर्चा

आरटीआई दस्तावेजों के सामने आने के बाद चुनाव आयोग की आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।

विशेष रूप से अधिकारियों के काम के बंटवारे, वरिष्ठ पदाधिकारियों के निर्देशों और संस्थागत निर्णय प्रक्रिया के बीच समन्वय महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आया है।

आयोग द्वारा पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विवादित कार्य विभाजन आदेश प्रभावी नहीं हुए थे। इसके बावजूद संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई न होने के कारणों को लेकर प्रशासनिक सवाल बने हुए हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल उपलब्ध जानकारी में संबंधित अधिकारी के खिलाफ किसी अंतिम अनुशासनात्मक कार्रवाई की पुष्टि नहीं होती।

आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्वाचन आयोग इस मामले में कोई अतिरिक्त औपचारिक निर्णय लेता है या नहीं और संबंधित प्रशासनिक शिकायतों पर कोई नई प्रक्रिया शुरू होती है या नहीं।

इस मामले में किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आयोग और कैबिनेट सचिवालय के आधिकारिक रिकॉर्ड तथा भविष्य में होने वाली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

 

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