बारिश से दिल्ली की हवा को मिलती है अस्थायी राहत, 5 दिन में फिर लौट आते हैं प्रदूषण के कण; 22 साल की स्टडी में खुलासा
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा एक लंबे वैज्ञानिक अध्ययन से लगाया जा सकता है। बारिश होने के बाद दिल्ली की हवा में मौजूद प्रदूषण के कण कुछ समय के लिए जरूर कम हो जाते हैं, लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती। एक नए अध्ययन के मुताबिक, बारिश के महज पांच दिनों के भीतर ही प्रदूषण के कण दोबारा बारिश से पहले के स्तर पर पहुंच जाते हैं।
इस अध्ययन में वर्ष 2003 से 2024 तक के करीब 22 साल के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें बारिश और हवा में मौजूद एरोसोल यानी बेहद छोटे प्रदूषण कणों के बीच संबंध को समझने की कोशिश की गई। शोध के नतीजे बताते हैं कि केवल बारिश के भरोसे दिल्ली की प्रदूषण समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता।
22 साल के अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
शोधकर्ताओं ने 2003 से 2024 के बीच बारिश की 600 से अधिक घटनाओं का विश्लेषण किया। अध्ययन के दौरान यह देखा गया कि बारिश के बाद वातावरण में मौजूद एरोसोल कणों की मात्रा कितनी कम होती है और फिर कितने समय में वापस पुराने स्तर पर पहुंच जाती है।
आंकड़ों के मुताबिक, 310 मामलों में यानी 50 फीसदी से अधिक घटनाओं में प्रदूषण के कण पांच दिनों के अंदर ही बारिश से पहले वाले स्तर पर पहुंच गए। इससे साफ होता है कि बारिश से मिलने वाली राहत अस्थायी होती है और प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण किए बिना हवा की गुणवत्ता में लंबे समय तक सुधार करना मुश्किल है।
प्रदूषण के दोबारा बढ़ने की बड़ी वजह स्थानीय उत्सर्जन
शोधकर्ताओं के मुताबिक, बारिश के बाद प्रदूषण के कणों के तेजी से लौटने की एक बड़ी वजह स्थानीय स्तर पर होने वाला उत्सर्जन है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और अन्य प्रदूषणकारी स्रोत लगातार वातावरण में नए कण छोड़ते रहते हैं।
बारिश के दौरान हवा में मौजूद कई कण पानी की बूंदों के साथ नीचे आ जाते हैं। इससे वातावरण में प्रदूषण की मात्रा कुछ समय के लिए कम हो जाती है। लेकिन जब प्रदूषण फैलाने वाले स्रोत लगातार सक्रिय रहते हैं, तो हवा में नए कण जमा होने लगते हैं और प्रदूषण का स्तर फिर बढ़ जाता है।
भारी बारिश से भी नहीं मिलता लंबे समय तक फायदा
अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है कि ज्यादा बारिश होने का मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण से मिलने वाली राहत भी ज्यादा समय तक बनी रहेगी। शोधकर्ताओं को बारिश की मात्रा और प्रदूषण के कणों के दोबारा पुराने स्तर पर पहुंचने के समय के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला।
यानी तेज बारिश होने के बावजूद प्रदूषण के कण कुछ ही दिनों में फिर से बढ़ सकते हैं। इसका कारण वातावरण में पहले से मौजूद प्रदूषण और लगातार जारी मानवीय गतिविधियां हैं।
मौसम के अनुसार बदलता है प्रदूषण की वापसी का समय
अध्ययन में अलग-अलग मौसमों के दौरान प्रदूषण के कणों के वापस लौटने की अवधि का भी विश्लेषण किया गया। इसमें मौसम के अनुसार अलग-अलग परिणाम सामने आए।
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मानसून के दौरान प्रदूषण के कणों को पुराने स्तर पर पहुंचने में औसतन 6 दिन लगे।
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गर्मियों में यह अवधि करीब 5 दिन रही।
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सर्दियों में भी प्रदूषण के कण करीब 5 दिन में वापस पुराने स्तर पर पहुंच गए।
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मानसून के बाद यानी पोस्ट-मानसून सीजन में यह अवधि घटकर करीब 3 दिन रह गई।
ये आंकड़े प्रत्येक मौसम में दर्ज घटनाओं के मध्य मान (मीडियन) पर आधारित हैं। इससे पता चलता है कि पोस्ट-मानसून के दौरान बारिश से मिलने वाली राहत अपेक्षाकृत जल्दी खत्म हो सकती है।
45 फीसदी मामलों में 30 दिन बाद भी नहीं लौटा था प्रदूषण
शोध में यह भी सामने आया कि प्रदूषण की वापसी हर बार एक जैसी नहीं होती। करीब 45 फीसदी बारिश की घटनाओं में 30 दिन बाद भी प्रदूषण के कण बारिश से पहले के स्तर तक नहीं पहुंचे थे।
इसका मतलब है कि कुछ परिस्थितियों में बारिश के बाद प्रदूषण का स्तर लंबे समय तक कम रह सकता है, जबकि कई दूसरी परिस्थितियों में यह तेजी से बढ़ जाता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रदूषण की वापसी का समय स्थानीय उत्सर्जन, वातावरण में पहले से मौजूद कणों और वायुमंडल में रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनने वाले नए कणों पर निर्भर करता है।
सैटेलाइट और मौसम के आंकड़ों से तैयार हुई रिपोर्ट
इस अध्ययन का शीर्षक ‘Why Rainfall Alone Cannot Mitigate Urban Pollution: Two Decades (2003–2024) of Satellite Observation Over Delhi’ है। इसे केरल स्थित अमृता विश्व विद्यापीठम के अमृता-नेचुरल रिसोर्स मॉनिटरिंग लैब की गायत्री बालाचंद्रन और डॉ. सुमित सतींद्रन एस ने तैयार किया है।
यह शोध Journal of Atmospheric and Solar-Terrestrial Physics में प्रकाशित हुआ है।
शोध के लिए वैज्ञानिकों ने 2003 से 2024 तक दिल्ली में हुई 612 बारिश की घटनाओं का विश्लेषण किया। इसमें सैटेलाइट से प्राप्त एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD), बारिश और मौसम से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में उन बारिश की घटनाओं को शामिल किया गया, जिनमें एक दिन में 5 मिलीमीटर से अधिक वर्षा दर्ज हुई थी।
यहां यह समझना जरूरी है कि AOD वातावरण में मौजूद एरोसोल कणों द्वारा प्रकाश के अवशोषण और बिखराव को मापता है। यह सीधे जमीन के स्तर पर PM2.5 या PM10 की मात्रा अथवा सरकारी AQI का आंकड़ा नहीं है।
दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए लगातार प्रयास जरूरी
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि दिल्ली में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल बारिश या मौसम में बदलाव पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसके लिए प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर लगातार नियंत्रण करना जरूरी है।
वाहनों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए सालभर प्रभावी कदम उठाने होंगे।
विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में समन्वित तरीके से प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति अपनाने की जरूरत है। तभी राजधानी की हवा में लंबे समय तक सुधार लाया जा सकता है।
अध्ययन का मुख्य संदेश यही है कि बारिश दिल्ली की हवा को कुछ समय के लिए साफ कर सकती है, लेकिन स्थायी राहत के लिए प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है।

